वायदे, समझौते, घोषणा पत्र, सरकार और आन्दोलन

बेटा 2 पायजामे सिलवाये है इनको पहन कर देख ले पायजामा पहनते पहनते मैं कहीं पीछे दौड़ पडा
“गुरू कुम्हार शिष कुंभ है,गढि गढि काढै खोट अंदर हाथ संहार दे,बाहर बाहै चोट”
कबीर दास जी का यह दोहा जो बया कर रहा है गुरु कुम्हार है और शिष्य मिट्टि के कच्चे घड़े के समान है जिस तरह कुम्हार घड़े को सुंदर बनाने के लिए अंदर हाथ डाल कर बाहर से थाप मारता है ठीक उसी प्रकार शिष्य को कठोर अनुशासन में रख कर अंदर से प्रेम भावना रखते हुए शिष्य की बुराइयों को दूर करते हुए संसार में सम्माननीय बनाता है
लेकिन अपना घड़ा तो गजब का था हमारे भीतर एक हाथ नहीं  बारी -बारी से तीन हाथ घुसते और फिर तीन ही हाथ बारी -बारी से थाप भी मारते ख़ूब कुटाई होती पर फिर वैसे के वैसे
हमारे माता-पिता और गुरूजी जान से हमें ज्ञानी बनाने पर आमदा थे और एक हम थे कि उनके लिए चैलेंज ही बन कर डटे थे ख़ुराफातों का सिलसिला तो स्कूल की पहली कक्षा से ही शुरु हो गया था 
स्कूल में रोजाना युनिफॉर्म में जाना कभी बिना युनिफॉर्म के पिटाई खाना माँ द्वारा सिलाया नया पायजामा पहना कर स्कूल भेजा नये पायजामा पहनने की ख़ुशी तो आसमान छू रही थी साल में ऐसे मौक़े कभी कभी ही आते वैसे भी कपड़ों की परवाह थी नहीं हमेशा नाडे वाली नेकर और हाप पेंट पहने रहते आज जैसे ड्रेस कोड कहाँ थे ? गांव के माहोल में सबका रहन -सहन पूरा ही समाजवादी था वहीं कंधे पर कपड़े का बस्ता, हाथ में स्लेट और खेतों से पगडंडी और पाल पर लूका छुपी का खेल खेलते कूदते -फाँदते स्कूल तक का सफ़र रास्ते में आते -जाते बडे पेड़ों पर मिनटों में जा चढ़ना खेजडे की सिंगरी,आम और नीम की निमोली और चना जो भी जब भी जहाँ से मिला मोर की पांख और विधा माता की पाखं बस्ते में जा समाती माटी के ढिंम और छोटे छोटे कंकर से सटीक निशाना भी लगाते टमाटर, तरबूज, पपीता, और काचरी का नमक की पुडिया के साथ स्वाद और आनंद की वह अपनी ही दुनिया 
हम सहपाठियों की टोली उदम मचाती जब स्कूल की चारदीवारी से बाहर लल्लू सेठ की दूकान से आगे जंगलात तक दौड़ लगाते हुए जाते कभी कभी खेलते खेलते आईस पाईस में झाड़ के सहारे चुपचाप छिपकर खड़े रहते और जैसे ही साथी पिछे से आकर आईस पाईस या थप्पी बोलता तो ऐसे जंगल में मानो एक बार तो ऐसे लगता जैसे पिछे से किसी जानवर ने झपट कर पकड़ लीया हो और जिस दिन नया पायजामा पहना उस दिन आईसपाईस में झाडी के आसरे में छिपा हुआ जैसे ही थप्पी लगाता इतने में झाडी में पायजामा उलझ कर फट गया अब अपने काँटों तो ख़ून नहीं झाडी के कांटों की चुबन ने कहाँ कितने तेज लगे यह तो ध्यान ही न आया ध्यान आया बस माँ का चेहरा और घुटने से नीचे फट कर लटका उस पायजामें का टुकड़ा थोड़ी देर को सब साथी सहमे खड़े रहे फिर उसी फटे टुकड़े को जोड़ने का प्रयास और खेलघंटी की टन टन की आवाज शुरू फिर स्कूल की ओर चल दिए किसी को कुछ न बताने की सबने गुपचुप सलाह की और चुपचाप अपनी -अपनी कक्षा में जा बैठे भय और निरंतर होती पीड़ा दबाए पढ़ाई में मन लगाए रखने का बहाना किए रहा
कक्षा में एक सहपाठी ने प्रवेश कर गुरुजी से कुछ कहा तो गुरुजी ने मेरा नाम पुकारा तुम्हें बड़े गुरूजी ने बुलवाया है जाओ 
मैं डर गया बहुत तेज घबराहट मुझे क्यों बुलवाया बड़े गुरूजी का डर जाकर देखा तो माँ स्कूल में आ गई
मेरे साँस तो ऊपर की ऊपर मैं भय से काँपने लगा था फटा पायजामा दिख रहा और बड़े गुरूजी की मेज़ पर नीम का डण्डा  आज मेरी सारी शरारतों का हिसाब माँग कर रहेगा माँ क्यो आई है स्कूल में ? इसे जब मेरे फटे पायजामे का पता चलेगा तो इसी डण्डे से कूटती घर तक ले जाएगी शरीफ बच्चे की तरह मेरी दोनों नजरें जमीन की ओर थीं पर नहीं माँ ने मुझसे कुछ न कहा प्यार से अपने पास बुलाकर उसने मेरा पायजामा ऊपर कर झाड़ी के काटे गिरने से फिसलन से छिलने के घाव को देखा और अपना हाथ सिर पर फेर अपने गोदी में उठा लिया
बड़े गुरुजी से कहकर मुझे सीधे घर ले आई माँ के चेहरे पर चिंता के बादल थे मैं चुपचाप माँ के साथ -साथ चल रहा था जब मुझे घर लाई तब तक भी मेरे भीतर पायजामा फटने की सजा का भय लगातार बना रहा लेकिन माँ ने अपने पास बिठा चूल्हे पर गर्म औटाया दूध हल्दी मुझे दिया सारे काम निबटा कर माँ ने सूई धागे लेकर मेरे पायजामे को बिल्कुल ठीक कर दिया 
 माँ का प्यार भी कुछ अलग अपनी ही तरह का रहा है जो गोद में बिठा कर दुलारना जो कभी भी न जताया जा सकता माँ का पूरे घर में चूल्हे की माटी से दहलीज तक गोबर से लिपाई करना अब कहीं महसूस क्यों नहीं होता ? 
बदलते वक़्त के साथ माँ का रूप कितना -कितना बदल गया है बच्चों की ए.सी बसें , ए.सी स्कूल , मनोवैज्ञानिक ढंग से शिक्षा का स्वरूप
लेकिन मेरी स्मृतियों में जो बाबा,माई, मौसी , चाचा , नाना नानी घर में रम्भाती भैस -बैल , माँ -पापाजी , स्कूल , संगी साथियों की जो छवियाँ है वह हुबहू वैसी की वैसी है वह न धुँधली पड़ीं न ही बदली

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