सहानुभूति और मनुष्यतव विद्यालयों का दोहरापन

सहानुभूति मनुष्यत्व के शिखर पर प्रतिष्ठित करती है सहानुभूति के सुमन जिस दिल में खिल जाए उस दिल में ही दया पले प्रेम वहां मुस्काए सहानुभूति के सुमन जब समानुभूति बन जाए पर की पीड़ा से द्रवित स्वयं मलहम बन जाए 
सहानुभूति एक ऐसी अंतरंग प्रेरणा है जो मनुष्य को सही अर्थों में मनुष्य बनाती है मनुष्य के अंदर मनुष्यत्व जगाती है सहानुभूति एक ऐसा दिव्य गुण है जो मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाता है
राजा हो मुख्यमंत्री हो मंत्रि हो कलेक्टर हो या कोई लोक सेवक हो अथवा अपने परिवार का मुखिया हो या फिर विद्यालय हो हेड मास्टर प्रिंसिपल हो या शिक्षक हो यह सभी महानुभाव सहानुभूति समानुभूति के बिना अपने पद और कर्तव्य के साथ न्याय नहीं कर सकते 
परिवार समाज एवं राष्ट्र का अभ्युदय इस बात पर निर्भर है कि इनके मुखिया अपने अधीनस्थ जनों की प्रति कितने संवेदनशील है संवेदनशील व्यक्ति की सहानुभूति समानुभूति का रूप लेकर जब व्यवहार के धरातल पर आती है तो मानवता की बगिया में परोपकार के नीर से सिंचित होकर मानवता के सुर्भित पुष्प सबका मन मोह लेते हैं मानवीय गुणों से उन्नत परिवार समाज और राष्ट्र के विकास के लिए आवश्यक है बचपन से ही परिवार माता-पिता विद्यालय शिक्षक बच्चों में सहानुभूति समानुभूति के संस्कार जरूरी है
जब भी कोई बच्चा गलत काम करें किसी के सिर के बाल खींचे या दूसरे बच्चों की किताब फाड़ दे या दूसरे के हिस्से का खाना खा जाए उसे उस समय समझाओ यही व्यवहार तुम्हारे साथ होगा तो कैसा लगेगा माता पिता बच्चों को गुल्लक में जैसे पैसा डालना सिखाते हैं ऐसे ही अपनी सहानुभूति पूर्ण व्यवहार से बच्चों के दिमाग रूपी गुल्लक में दया करुणा परोपकार के संस्कार भी बुद्धि पूर्वक दे
एक भाई अपनी छोटी बहन के बाल पकड़कर खींचता है बहन रोती है उसे मजा आता है उसके लिए यह खेल है मां ने कई बार प्यार से समझाया वह नहीं माना एक दिन पिता ने बेटे के बाल खींचे बेटा रोया और मां मां चिल्लाया मां ने उपेक्षा की पिता ने एक बार और जोर से बाल खींच कर कड़क आवाज में डांटते हुए कहा खबरदार अब बहन के बाल खींचे बेटा रोता रोता दौड़ कर मां के पास पहुंचा मां ने उपेक्षा से कहा तुम से हमें कोई मतलब नहीं तुम बात नहीं मानते बहन ने आकर भाई के शिर को सहलाया मां ने कहा देख और समझ तू बहन को सताता है उसके बाल खींचता है वही बहन तेरा सिर सहला कर प्रेम कर रही है भाई बोला मां अब बहन को नहीं सताउंगा बाल खींचने पर बहुत दर्द होता है मुझे आज मालूम चला मेरी मां ने भी बचपन में मेरे द्वारा कुत्तिया के बच्चों को कंकड़ पत्थरों से मारने पर नुकीली झाड़ू से मुझे दंडित कर यही ज्ञान दिया था
किसी की वेदना को वेदना समझकर उसके दर्द को महसूस कर उसे दूर करने के लिए तत्पर हो जाना सही समानुभूति है आज जिनके अंदर दया नहीं है वह दर्द को दर्द तो मानते हैं लेकिन वह उस पीड़ा की घड़ी में भी पीड़ित को लूटने से नहीं चूकते यहां दया का स्पष्ट अभाव है स्वार्थ जब हावी हो जाता है तो पहरेदार   चोर रक्षक भक्षक बन जाता है यहां दूसरे की पीड़ा समझना ही आवश्यक नहीं है पीड़ा को दूर करने का प्रयास भी आवश्यक है यही वह बात है जो मनुष्य को मनुष्यत्व से जोड़कर सच्चा इंसान बनाती है धन्य है वह लोग जो मानवता से सहानुभूति रख  एक दूसरे के दुख की घड़ी में पास खड़े ही नहीं रहते उस दुख को महसूस कर दूर करने का प्रयास भी करते हैं जो इस भाव से गांव में चिकित्सा सेवा दे रहे है अथवा गांव के बच्चों को अध्ययन करा रहे है और गांव ही क्यों शहर में झुग्गी झोपड़ियों में गरीब बस्तियों में इस पावन भाव से जो भी सेवा कर रहे हैं वह मानवता के शिखर हैं वंदनीय है भले ही उन्हें कोई ना जानता हो प्रचार तंत्र का उन पर ध्यान ना हो लेकिन उनका कर्म उन्हें जानता है परोपकार परहित के यज्ञ में दी गई अपने सत्कर्म की आहूती कभी भी व्यर्थ नहीं जाती उसकी खुशबू चंदन की खुशबू से ज्यादा महकती है और एक दिन अपना मान सम्मान स्थान भी पाती है
सरकार का फरमान जारी हुआ कि सभी अधिकारी गाँवों के निरंतर सम्पर्क में रह कर वहाँ की समस्याओं से पूरी तरह अवगत रहें आदेशों का पालन करते हुए मुख्य शिक्षा अधिकारी अपने क्षेत्र के गाँवों में दौरा कर रहे थे हर दौरे की रिपोर्ट अपने अधिकारियों को नियमित पहुँचा रहे थे गाँवो का दौरा रोजाना चल रहा है बड़े हॉल में सभी गाँववासियों को बुलाया गया पूरा हाल साहब के पहुँचते ही खचाखच भर गया
पूरा एक घंटा साहब शिक्षा के महत्व पर बोले लोगों को समझाया कि उनके गाँव में जो उच्च माध्यमिक विद्यालय खुला है वहाँ बच्चों को नियमित रूप से भेजें और सरकारी सुविधा का लाभ उठाएँ छोटे बच्चों को मिड डे मील पर भी उन्होंने स्कूल के अध्यापकों से जानकारी ली गाँव वालों से भी उन्होंने स्कूल सम्बंधी शिकायतों को सुना और स्कूल वालों को आवश्यक निर्देश दिए 
कार्यक्रम समाप्ति पर था कि गाँव की बुढ़िया दादी अपनी लाठी की ज़ोर दार ठक -ठक करती बीच सभा में पहुँची 
रुको ..... रुको साहब जी गाँव वालों की समस्या सुनने आए हो मेरी भी समस्या दूर करो वह मंच के एक दम सामने थी
हाँ बताओ माताजी क्या परेशानी है साहब ने पूछा 
 गांव में बढ़िया स्कूल खुलवा दो एक दादी ने अपनी माँग रखी
बढ़िया स्कूल है ना माँ जी उच्च माध्यमिक सरकारी विद्यालय है गाँव में
ना य नहीं यहाँ तो वैसा खुलवा दो जिसमें पढ़वाने के चक्कर में मेरी बहू बच्चे लेकर शहर चली गई बताया कोई अंग्रेजी स्कूल है जहाँ बढ़िया पढ़ाई होती है
अब बताओ साहब गर वो स्कूल म्हारे गाँव होता तो बहू मेरे पोते -पोतियो को लेके शहर में तो नहीं बैठती मैं 80 बरस की बुढ़िया रह गयी अकेली घर देखूं जमीन देखू या अपने को देख लूं  मै नहीं जानती अब आए हो तो म्हारी बिनती सुन पूरा करो
मंच पर बैठे साहब मौन थे
शिक्षा व्यवस्था का दोहरापन साहब के सामने चुनौति बन खड़ा था अपने सवालों के साथ

Comments