बेरोजगारी
बेरोजगारी देश का अभिशाप,जो जमीनी हकीकत है।
आज लोकतंत्र के शासन मे बेरोजगारी अभिशाप बनकर देश के कोने कोने मे युवाओ को खोखला कर रही है देश मे करोड़ो युवा डिग्री लेकर भी दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर है क्यों? कोई बेटा किसान का,मजदूर का,मध्यम का ? क्या सपने उनके नहीं मोबाइल रखने के,अच्छा खाने, अच्छा पहनने, अच्छा घूमने के बस शहरीकरण के इस चकाचौध मे वो भी भटक रहा है यदि समय पर स्थिति न सम्हाली गयी तो यही भटकाव दीमक की तरह खा जाएगा चारों ओर देश को, सिर्फ तैयार होगा अशांति का वातावरण क्योंकि जिस सामाजिक वातावरण परिवेश मे वो रहेंगे उनकी मनोबुद्धि पर उसी परिवेश का रंग लगना मानवता का स्वाभाविक व्यवहार है जो अटल सत्य है जैसी संगत वैसी रंगत।
यदि जल्द ही सरकारें ध्यान नहीं देती तो युवा पीढ़ी पैसों के लालच मे भटकने को तैयार दिन व दिन तैयार है जो आये दिन समाचार पत्रों मे देखने को मिलता है,कभी जाति के नाम पर,धर्म के नाम पर कई बार सोशल मीडिया पर स्वयं मे युवाओ को भटकते शब्दो का प्रयोग करते पाया चंद पैसों की लालच मे,परिवार के दवाब मे, आर्थिक स्थिति सुधारने की चाह मे उन्हें यह नहीं पता कि दीमक की तरह स्वयं धरती माँ को लहूलुहान करने की मंशा रखने वाले उनके इन निर्णयों से अपने मकसद मे कामयाब होंगे, वो लोग जो शान्ति नहीं चाहते देश मे।
क्या यह बात विदेशों मे नहीं जा रही होगी कि आज युवा धर्म, जाति, सम्प्रदाय,के लिये आपस मे ही लड़ने को तैयार है इस पृष्ठभूमि को तैयार करके गद्दारो को कौन दे रहा है हम स्वयं
क्यों ये दिन देखने पड रहे हैं स्थिति आज नहीं संभली तो समय आगे भयावह होगा ही?
यह सवाल उसे शर्मिदा कर देता है।
कि क्या कर रहा है वो आजकल
वह डकैती नहीं डालता
वह तस्करी नहीं करता
वह हत्याये नहीं करता
वह फरेबी वादे नही करता
वह देश नहीं चलाता
फिर भी यह सवाल उसे शर्मिदा कर देता है
कि क्या कर रहा है वो आजकल
वो सिर्फ नजरे झुकाए खुद को ताकता है आजकल।
वो बेबस है वो लाचार है वो भेंट चढ़ रहा है।
आज सिफारिशों की,भ्रष्टाचार की,।
यही तो माहौल है आज बनाया भारत का।
बेरोजगार की जुबानी
रोजगार की तलाश में भटकता हूँ
बेरोजगारी के भार से डरता हूँ
अंधेरों में ग़ुम मेरी ज़िन्दगी है
अब मैं क्यों नहीं चमकता हूँ
कीमती मोती सा था कभी
अब बेकार सा टपकता हूँ
ग़म भर रह जातें हैं मेरे
जब मैं रिश्तेदारी में फटकता हूँ
छुड़ा लेते है सब हाथ अपना
फिर भी उम्मीद में अटकता हूँ
मेरी नाकामयाबी ही है
जिससे आँख में खटकता हूँ
टूट गया हूँ ज़माने के ताने से
इसलिए मैं छिपता छिटकता हूँ
लोगों का काम ही है कहना
यही सोचकर नहीं डपटता हूँ |
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